अंतिम प्रभा का है हमारा विक्रमी संवत यहाँ, है किन्तु औरों का उदय इतना पुराना भी कहाँ ?
ईसा,मुहम्मद आदि का जग में न था तब भी पता, कब की हमारी सभ्यता है, कौन सकता है बता? -मैथिलिशरण गुप्त
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मंगलवार, 27 अगस्त 2013

गति के नियम : महर्षि कणाद | Laws of Motion by Maharishi Kanada : 600BC

जी हाँ दोस्तों ,
शीर्षक बिलकुल सही है इस संसार को गति के नियम महर्षि कणाद ने दिए है ना की कोई न्यूटन फ्यूटन ने ।


वैशेषिक दर्शन (Vaisheshika Sutra) के रचनाकार महर्षि कणाद लगभग २ या ६ ईसा पूर्व प्रभास क्षेत्र द्वारका के निकट गुजरात में जन्मे ।
दुनिया को पहला परमाणु का ज्ञान देने वाले भी ऋषि कणाद ही है । इन्ही के नाम पर परमाणु का एक नाम कण पड़ा ।
 यहाँ देखें :- http://www.vedicbharat.com/2013/02/blog-post_4711.html

वैशेषिक दर्शन  में इन्होने गति के लिए कर्म शब्द प्रयुक्त किया है । इसके पांच प्रकार हैं यथा :

उत्क्षेपण (upward motion)
अवक्षेपण (downward motion)
आकुञ्चन (Motion due to the release of tensile stress)
प्रसारण (Shearing motion)
गमन (General Type of motion)

विभिन्न कर्म या motion को उसके कारण के आधार पर जानने का विश्लेषण वैशेषिक में किया है।

(१) नोदन के कारण-लगातार दबाव
(२) प्रयत्न के कारण- जैसे हाथ हिलाना
(३) गुरुत्व के कारण-कोई वस्तु नीचे गिरती है
(४) द्रवत्व के कारण-सूक्ष्म कणों के प्रवाह से

Dr. N.G. Dongre अपनी पुस्तक 'Physics in Ancient India'  में वैशेषिक सूत्रों  के ईसा की प्रथम शताब्दी में लिखे गए  प्रशस्तपाद भाष्य में उल्लिखित वेग संस्कार और न्यूटन द्वारा 1675 में खोजे गए गति के नियमों की तुलना की है ।

महर्षि प्रशस्तपाद लिखते हैं
‘वेगो पञ्चसु द्रव्येषु निमित्त-विशेषापेक्षात्‌ कर्मणो जायते नियतदिक्‌ क्रिया प्रबंध हेतु: स्पर्शवद्‌ द्रव्यसंयोग विशेष विरोधी क्वचित्‌ कारण गुण पूर्ण क्रमेणोत्पद्यते।‘

 अर्थात्‌ वेग या मोशन पांचों द्रव्यों (ठोस, तरल, गैसीय) पर निमित्त व विशेष कर्म के कारण उत्पन्न होता है तथा नियमित दिशा में क्रिया होने के कारण संयोग विशेष से नष्ट होता है या उत्पन्न होता है।

उपर्युक्त प्रशस्तिपाद के भाष्य को तीन भागों में विभाजित करें तो न्यूटन के गति सम्बंधी नियमों से इसकी समानता ध्यान आती है।

(१) वेग: निमित्तविशेषात्‌ कर्मणो जायते

The change of motion is due to impressed force (Principia)

(२) वेग निमित्तापेक्षात्‌ कर्मणो जायते नियत्दिक्‌ क्रिया प्रबंध हेतु

The change of motion is proportional‌ to the motive force impressed and is made in the direction of the right line in which‌ the force is impressed (Principia)

(३) वेग: संयोगविशेषाविरोधी

To every‌ action there is always an equal‌ and opposite reaction (Principia)


वैशेषिक सूत्र में गति के साथ साथ ब्रह्माण्ड , समय तथा अणु /परमाणु  का ज्ञान भी है जिसके  अंग्रेज भी बहुत दीवाने है देखिये , ये निम्न एक पीडीऍफ़ फाइल दे रहा हूँ ये मुझे अमेरिका के एक कॉलेज  की  साईट पर मिली

Division of Electrical & Computer Engineering, School of Electrical Engineering and Computer Science
3101 P. F. Taylor Hall • Louisiana State University • Baton Rouge, LA 70803, USA

Space, Time and Anu (Atom) in Vaisheshika -> http://www.ece.lsu.edu/kak/roopa51.pdf

 चाहे तो http://www.ece.lsu.edu/ में जाएँ और सर्च बॉक्स में kanad  लिखें

अंग्रेज  हमारी चीजें पढ़ कर हमें पढ़ा रहे है वो भी अपने नाम से , कैसे दिन आ गये !!
दयानंद जी ने सत्यार्थ प्रकाश में आर्यों की ऐसी स्थति पर बड़ा दुःख व्यक्त किया है
http://phys.org/news106238636.html

वैशेषिक सूत्र आप पढना चाहें तो यहाँ से डाउनलोड कर सकते है :--
http://www.jainlibrary.org/elib_master/jlib/002501_book_hindi_21/Vaisheshika_Sutra_002759.pdf
http://darshanapress.com/The%20Vaisheshika%20Darshana.pdf



                                                            सनातन्  धर्मं: नमो नमः



TIME TO BACK TO VEDAS
वेदों की ओर लौटो । 


सत्यम् शिवम् सुन्दरम्


गुरुवार, 23 मई 2013

कामसूत्र : अश्लीलता नही योन शिक्षा ! (KamaSutra first book on sex education)


कामसूत्र... आज भी सार्वजनिक रूप से इस पुस्‍तक की चर्चा करना तो दूर इसका नाम लेना भी कई लोगों को असहज कर देता है। लोगों की नजर में इस ग्रंथ की बात करना अनैतिक माना जाता है। लोग यही मानते हैं कि यह एक यौन ग्रंथ है जिसमें केवल सेक्‍स की बातें की गयी हैं। और सेक्‍स तो वैसे ही भारतीय समाज में चारदीवारी के पीछे बोले जाने वाली शब्‍दावली का हिस्‍सा है। इस पर न तो सार्वजनिक मंचों पर चर्चा की जाती है और ही ऐसा करना उचित ही माना जाता है। 
ऐसे में कामसूत्र जैसी महान रचना पर बात की सोची भी नहीं जा सकती। हालांकि, जिन लोगों ने भी कामसूत्र को पढ़ा है या इसके बारे में आम लोगों से ज्‍यादा जानते हैं, उन्‍हें पता है कि कामसूत्र महज एक यौन आधारित पुस्‍तक नहीं है। इसमें काफी कुछ समाहित किया गया है। वास्‍तव में यह जीवनशैली पर चर्चा करती है। यह बताती है कि कामसूत्र में काम यानी सेक्‍स तो है, लेकिन उस काम का किसी मनुष्‍य के जीवन पर क्‍या असर पड़ता है और कैसे इसके जरिए मनुष्‍य अपने जीवन को सकारात्‍मक बना सकता है।
जहाँ प्राचीन भारत में एक से एक तकनीक विकसित थी तथा ज्ञान विज्ञानं पर अनेकों अनुसन्धान किये जाते थे  वहीँ महर्षि वात्‍स्‍यायन ने काम को भी जीवन का एक आवश्यक अंग माना अपने ज्ञान के आधार पर कामसूत्र की रचना की !
क्योंकी काम के अभाव में सृष्टि सृजन का अभाव होगा और सृष्टि सृजन के अभाव में सृष्टि का विनाश तय है । 




"The Kamasutra is not exclusively on sex as popularly believed. It is a guide book or art of leading a virtuously which touches upon many aspects of social and individual life such as nature of love, family life and pleasure oriented activities with much needed restraint.

It offers an excellent commentary on various aspects of a householder’s life in providing better sex life and may helps in solving sexual problems.

Over the years, kamasutra has been translated into many languages, making its space in the world literature."

-Onlymyhealth editorial team


अक्सर मैंने कुछ लोगो विशेषत: मुसलमानों को ये कहते सुना है की सनातन धर्म में कामसूत्र एक कलंक है और वे बार बार कुछ पाखंडियो बाबाओ के साथ साथ कामसूत्र को लेकर सनातन धर्म पर तरह तरह के अनर्लग आरोप व् आक्षेप लगाते रहते है| चूँकि जब मैंने ऋषि वात्सयायन द्वारा रचित कामसूत्र का अध्ययन किया तो ज्ञात हुआ की कामसूत्र को लेकर जितना दुष्प्रचार हिन्दुओ ने किया है उतना तो मुसलमानों और अंग्रेजो ने भी नहीं किया | मुसलमान विद्वान व् अंग्रेज इस बात पर शोर मचाते रहते है की भारतीय संस्कृति में कामसूत्र के साथ साथ अश्लीलता भरी हुई है और ऐसे में वे खजुराहो और अलोरा अजन्ता की गुफाओं की मूर्तियों, चित्रकारियो का हवाला दे कर भारत संस्कृति के खिलाफ जमकर दुष्प्रचार करते है|

आज मैं आप सभी के समक्ष उन सभी तथ्यों को उजागर करूँगा जिसके अनुसार कामसूत्र अश्लील न होकर एक जीवन पद्दति पर आधारित है, ये भारतीय संस्कृति की उस महानता को दर्शाता है जिसने पति पत्नी को कई जन्मो तक एक ही बंधन में बाँधा जाता है और नारी को उसके अधिकार के साथ धर्म-पत्नी का दर्जा मिलता है, भारतीय संस्कृति में काम को हेय की दृष्टि से न देख कर जीवन के अभिन्न अंग के रूप में देखा गया है, इसका अर्थ ये नहीं की हमारी संस्कृति अश्लील है, कामसूत्र में काम को इन्द्रियों द्वारा नियंत्रित करके भोगने का साधन दर्शाया गया है, वास्तव में ये केवल एक दुष्प्रचार है की कामसूत्र में अश्लीलता है और ये विचारधारा तब और अधिक फैली जब कामसूत्र फिल्म आई थी, जिसमे काम को एक वासना के रूप में दिखा कर न केवल ऋषि वात्सयायन का अपमान किया गया था अपितु ये ऋषि वात्स्यायन द्वारा रचित कामसूत्र के असली मापदंडो के भी प्रतिकूल है!

किन्तु उससे पहले ये भी जान लेते है की मुस्लिम हर समय, हर जगह , हर वस्तु के बारे में इतना निम्न कैसे सोच पाते  है ?  जब में इस सवाल का उत्तर खोज रहा था तब एक साईट पर जा पहुंचा , वहां मुझे उत्तर प्राप्त हुआ ।
इस्लाम में कुरान के पश्चात  हदीसों को सर्वाधिक मान्यता दी गई है । आपको पता है इन हदीसों में मनुष्य के वीर्य का रंग तथा स्वाद तक लिखा गया है .

“अनस बिन मलिक कहा कि रसूल ने उम्म सलेम को बताया कि पुरुषों के वीर्य का रंग सफ़ेद होता है और गाढ़ा होता है .और बेस्वाद होता है .लेकिन स्त्री का वीर्य पतला ,पीला और तल्ख़ होता है “अबू दाऊद -किताब 3 हदीस 608 

“उम्म सलेम ने कहा कि ,रसूल ने कहा कि स्त्रियों कि योनी से हमेशा एक स्राव निकलता रहता है .जिसका रंग पीला होता है .रसूल ने फिर कहा कि मुझे यह बात कहने कोई शर्म नहीं है कि , योनी के स्राव का स्वाद तल्ख़ और तीखा होता है “अबू दाऊद -किताब 3 हदीस 610 

अब बताइए की बिना चखे वीर्य का स्वाद कैसे पता चला ??

एक छोटा सा नमूना और दिखा दूँ :-
हदीसों में जन्नत का जो वर्णन मिलता है वो आप स्वयं इन मोलवी महाशय के मुख से सुनिए . अगर ये जन्नत का वर्णन है तो फिर कोठे का वर्णन क्या होगा ?



साभार http://hindurashtra.wordpress.com/2012/03/27/138/

उपर प्रस्तुत की गई अश्लील सामग्री के लिए क्षमा करें , किन्तु सत्य बताना अनिवार्य था !

खैर ,, आगे बढ़ते है .

कौन थे महर्षि वात्‍स्‍यायन?

महर्षि वात्स्यायन भारत के प्राचीनकालीन महान दार्शनिक थे. इनके काल के विषय में इतिहासकार एकमत नहीं हैं. अधिकृत प्रमाण के अभाव में महर्षि का काल निर्धारण नहीं हो पाया है. कुछ स्‍थानों पर इनका जीवनकाल ईसा की पहली शताब्‍दी से पांचवीं शताब्‍दी के बीच उल्लिखित है. वे ‘कामसूत्र’ और ‘न्यायसूत्रभाष्य’ नामक कालजयी ग्रथों के रचयिता थे. महर्षि वात्स्यायन का जन्म बिहार राज्य में हुआ था. उन्‍होंने कामसूत्र में न केवल दाम्पत्य जीवन का श्रृंगार किया है, बल्कि कला, शिल्पकला और साहित्य को भी श्रेष्‍ठता प्रदान की है. कामसूत्र’ का अधिकांश भाग मनोविज्ञान से संबंधित है. यह जानकर अत्‍यंत आश्‍चर्य होता है कि आज से दो हजार वर्ष से भी पहले विचारकों को स्‍त्री और पुरुषों के मनोविज्ञान का इतना सूक्ष्‍म ज्ञान था. इस जटिल विषय पर वात्‍स्‍यायन रचित ‘कामसूत्र’ बहुत ज्‍यादा प्रसिद्ध हुआ.
भारतीय संस्‍कृति में कभी भी ‘काम’ को हेय नहीं समझा गया. काम को ‘दुर्गुण’ या ‘दुर्भाव’ न मानकर इन्‍हें चतुर्वर्ग अर्थ, काम, मोक्ष, धर्म में स्‍थान दिया गया है. हमारे शास्‍त्रकारों ने जीवन के चार पुरुषार्थ बताए हैं- ‘धर्म’, ‘अर्थ’, ‘काम’ और ‘मोक्ष’. सरल शब्‍दों में कहें, तो धर्मानुकूल आचरण करना, जीवन-यापन के लिए उचित तरीके से धन कमाना, मर्यादित रीति से काम का आनंद उठाना और अंतत: जीवन के अनसुलझे गूढ़ प्रश्‍नों के हल की तलाश करना. वासना से बचते हुए आनंददायक तरीके से काम का आनंद उठाने के लिए कामसूत्र के उचित ज्ञान की आवश्‍यकता होती है. वात्‍स्‍यायन का कामसूत्र इस उद्देश्‍य की पूर्ति में एकदम साबित होता है. ‘काम सुख’ से लोग वंचित न रह जाएं और समाज में इसका ज्ञान ठीक तरीके से फैल सके, इस उद्देश्‍य से प्राचीन काल में कई ग्रंथ लिखे गए.

जीवन के इन चारों पुरुषार्थों के बीच संतुलन बहुत ही आवश्‍यक है. ऋषि-मुनियों ने इसकी व्‍यवस्‍था बहुत ही सोच-विचारकर दी है. यानी ऐसा न हो कि कोई केवल धन कमाने के पीछे ही पड़ा रहे और नीति-शास्‍त्रों को बिलकुल ही भूल जाए. या काम-क्रीड़ा में इतना ज्‍यादा डूब जाए कि उसे संसार को रचने वाले की सुध ही न रह जाए.

मनुष्‍य को बचपन और यौवनावस्‍था में विद्या ग्रहण करनी चाहिए. उसे यौवन में ही सांसारिक सुख और वृद्वावस्‍था में धर्म व मोक्ष प्राप्ति का प्रयत्‍न करना चाहिए. अवस्‍था को पूरी तरह से निर्धारित करना कठिन है, इसलिए मनुष्‍य ‘त्रिवर्ग’ का सेवन इच्‍छानुसार भी कर सकता है. पर जब तक वह विद्याध्‍ययन करे, तब तक उसे ब्रह्मचर्य रखना चाहिए यानी ‘काम’ से बचना चाहिए.

कान द्वारा अनुकूल शब्‍द, त्‍वचा द्वारा अनूकूल स्‍पर्श, आंख द्वारा अनुकूल रूप, नाक द्वारा अनुकूल गंध और जीभ द्वारा अनुकूल रस का ग्रहण किया जाना ‘काम’ है. कान आदि पांचों ज्ञानेन्द्रियों के साथ मन और आत्‍मा का भी संयोग आवश्‍यक है.

स्‍पर्श विशेष के विषय में यह निश्चित है कि स्‍पर्श के द्वारा प्राप्‍त होने वाला विशेष आनंद ‘काम’ है. यही काम का प्रधान रूप है. कुछ आचार्यों का मत है कि कामभावना पशु-पक्षियों में भी स्‍वयं प्रवृत्त होती है और नित्‍य है, इसलिए काम की शिक्षा के लिए ग्रंथ की रचना व्‍यर्थ है. दूसरी ओर वात्‍स्‍यायन का मानना है कि चूंकि स्‍त्री-पुरुषों का जीवन पशु-पक्षियों से भिन्‍न है. इनके समागम में भी भिन्‍नता है, इसलिए मनुष्‍यों को शिक्षा के उपाय की आवश्‍यकता है. इसका ज्ञान कामसूत्र से ही संभव है. पशु-पक्षियों की मादाएं खुली और स्‍वतंत्र रहती हैं और वे ऋतुकाल में केवल स्‍वाभाविक प्रवृत्ति से समागम करती हैं. इनकी क्रियाएं बिना सोचे-विचारे होती हैं, इसलिए इन्‍हें किसी शिक्षा की आवश्‍यकता नहीं होती.
वात्‍स्‍यायन का मत है कि मनुष्‍य को काम का सेवन करना चाहिए, क्‍योंकि कामसुख मानव शरीर की रक्षा के लिए आहार के समान है. काम ही धर्म और अर्थ से उत्‍पन्‍न होने वाला फल है.  हां, इतना अवश्‍य है कि काम के दोषों को जानकर उनसे अलग रहना चाहिए| कुछ आचार्यों का मत है कि स्त्रियों को कामसूत्र की शिक्षा देना व्‍यर्थ है, क्‍योंकि उन्‍हें शास्‍त्र पढ़ने का अधिकार नहीं है. इसके विपरीत वात्‍स्‍यायन का मत है कि स्त्रियों को इसकी शिक्षा दी जानी चाहिए, क्‍योंकि इस ज्ञान का प्रयोग स्त्रियों के बिना संभव नहीं है.
आचार्य घोटकमुख का मत है कि पुरुष को ऐसी युवती से विवाह करना चाहिए, जिसे पाकर वह स्‍वयं को धन्‍य मान सके तथा जिससे विवाह करने पर मित्रगण उसकी निंदा न कर सकें. वात्‍स्‍यायन लिखते हैं कि मनुष्‍य की आयु सौ वर्ष की है. उसे जीवन के विभिन्‍न भागों में धर्म, अर्थ और काम का सेवन करना चाहिए. ये ‘त्रिवर्ग’ परस्‍पर सं‍बंधित होना चाहिए और इनमें विरोध नहीं होना चाहिए.
कामशास्‍त्र पर वात्‍स्‍यायन के ‘कामसूत्र’ के अतिरिक्‍त ‘नागर सर्वस्‍व’, ‘पंचसायक’, ‘रतिकेलि कुतूहल′, ‘रतिमंजरी’, ‘रतिरहस्‍य’ आदि ग्रंथ भी अपने उद्देश्‍य में काफी सफल रहे.
वात्‍स्‍यायन रचित ‘कामसूत्र’ में अच्‍छे लक्षण वाले स्‍त्री-पुरुष, सोलह श्रृंगार, सौंदर्य बढ़ाने के उपाय, कामशक्ति में वृद्धि से संबंधित उपायों पर विस्‍तार से चर्चा की गई है.
इस ग्रंथ में स्‍त्री-पुरुष के ‘मिलन’ की शास्‍त्रोक्‍त रीतियां बताई गई हैं. किन-किन अवसरों पर संबंध बनाना अनुकूल रहता है और किन-किन मौकों पर निषिद्ध, इन बातों को पुस्‍तक में विस्‍तार से बताया गया है.
भारतीय विचारकों ने ‘काम’ को धार्मिक मान्‍यता प्रदान करते हुए विवाह को ‘धार्मिक संस्‍कार’ और पत्‍नी को ‘धर्मपत्‍नी’ स्‍वीकार किया है. प्राचीन साहित्‍य में कामशास्‍त्र पर बहुत-सी पुस्‍तकें उपलब्‍ध हैं. इनमें अनंगरंग, कंदर्प, चूड़ामणि, कुट्टिनीमत, नागर सर्वस्‍व, पंचसायक, रतिकेलि कुतूहल, रतिमंजरी, रहिरहस्‍य, रतिरत्‍न प्रदीपिका, स्‍मरदीपिका, श्रृंगारमंजरी आदि प्रमुख हैं.
पूर्ववर्ती आचार्यों के रूप में नंदी, औद्दालकि, श्‍वेतकेतु, बाभ्रव्‍य, दत्तक, चारायण, सुवर्णनाभ, घोटकमुख, गोनर्दीय, गोणिकापुत्र और कुचुमार का उल्‍लेख मिलता है. इस बात के पर्याप्‍त प्रमाण हैं कि कामशास्‍त्र पर विद्वानों, विचारकों और ऋषियों का ध्‍यान बहुत पहले से ही जा चुका था.

वात्‍स्‍यायन ने ब्रह्मचर्य और परम समाधि का सहारा लेकर कामसूत्र की रचना गृहस्‍थ जीवन के निर्वाह के लिए की . इसकी रचना वासना को उत्तेजित करने के लिए नहीं की गई है. संसार की लगभग हर भाषा में इस ग्रन्थ का अनुवाद हो चुका है. इसके अनेक भाष्य और संस्करण भी प्रकाशित हो चुके हैं. वैसे इस ग्रन्थ के जयमंगला भाष्य को ही प्रमाणिक माना गया है. कामशास्‍त्र का तत्व जानने वाला व्‍यक्ति धर्म, अर्थ और काम की रक्षा करता हुआ अपनी लौकिक स्थिति सुदृढ़ करता है. साथ ही ऐसा मनुष्‍य जितेंद्रिय भी बनता है. कामशास्‍त्र का कुशल ज्ञाता धर्म और अर्थ का अवलोकन करता हुआ इस शास्‍त्र का प्रयोग करता है. ऐसे लोग अधिक वासना धारण करने वाले कामी पुरुष के रूप में नहीं जाने जाते.
वात्‍स्‍यायन ने कामसूत्र में न केवल दाम्पत्य जीवन का श्रृंगार किया है, बल्कि कला, शिल्पकला और साहित्य को भी श्रेष्‍ठता प्रदान की है. राजनीति के क्षेत्र में जो स्थान कौटिल्य का है, काम के क्षेत्र में वही स्थान महर्षि वात्स्यायन का है. करीब दो सौ वर्ष पूर्व प्रसिद्ध भाषाविद् सर रिचर्ड एफ़ बर्टन ब्रिटेन में इसका अंग्रेज़ी अनुवाद करवाया. अरब के विख्यात कामशास्त्र ‘सुगन्धित बाग’ पर भी इस ग्रन्थ की छाप है. राजस्थान की दुर्लभ यौन चित्रकारी के अतिरिक्‍त खजुराहो, कोणार्क आदि की शिल्पकला भी कामसूत्र से ही प्रेरित है.
एक ओर रीतिकालीन कवियों ने कामसूत्र की मनोहारी झांकियां प्रस्तुत की हैं. दूसरी ओर गीत-गोविन्द के रचयिता जयदेव ने अपनी रचना ‘रतिमंजरी’ में कामसूत्र का सार-संक्षेप प्रस्तुत किया है.

कामसूत्र के अनुसार -
स्‍त्री को कठोर शब्‍दों का उच्‍चारण, टेढ़ी नजर से देखना, दूसरी ओर मुंह करके बात करना, घर के दरवाजे पर खड़े रहना, द्वार पर खड़े होकर इधर-उधर देखना, घर के बगीचे में जाकर किसी के साथ बात करना और एकांत में अधिक देर तक ठहरना त्‍याग देना चाहिए.
स्‍त्री को चाहिए कि वह पति को आकर्षित करने के लिए बहुत से भूषणों वाला, तरह-तरह के फूलों और सुगंधित पदार्थों से युक्‍त, चंदन आदि के विभिन्‍न अनूलेपनों वाला और उज्‍ज्‍वल वस्‍त्र धारण करे.
स्‍त्री को अपने धन और पति की गुप्‍त मंत्रणा के बारे में दूसरों को नहीं बताना चाहिए.
पत्‍नी को वर्षभर की आय की गणना करके उसी के अनुसार व्‍यय करना चाहिए.
स्‍त्री को चाहिए कि वह सास-ससुर की सेवा करे और उनके वश में रहे. उनकी बातों का उत्तर न दे. उनके सामने बोलना ही पड़े, तो थोड़ा और मधुर बोले और उनके पास जोर से न हंसे. स्‍त्री को पति और परिवार के सेवकों के प्रति उदारता और कोमलता का व्‍यवहार करना चाहिए.
स्‍त्री और पुरुष में ये गुण होने चाहिए- प्रतिभा, चरित्र, उत्तम व्‍यवहार, सरलता, कृतज्ञता, दीर्घदृष्टि, दूरदर्शी. प्रतिज्ञा पालन, देश और काल का ज्ञान, नागरिकता, अदैन्‍य न मांगना, अधिक न हंसना, चुगली न करना, निंदा न करना, क्रोध न करना, अलोभ, आदरणीयों का आदर करना, चंचलता का अभाव, पहले न बोलना, कामशास्‍त्र में कौशल, कामशास्‍त्र से संब‍ंधित क्रियाओं, नृत्‍य-गीत आदि में कुशलता. इन गुणों के विपरीत दशा का होना दोष है.
ऐसे पुरुष यदि ज्ञानी भी हों, तो भी समागम के योग्‍य नहीं हैं- क्षय रोग से ग्रस्‍त, अपनी पत्‍नी से अधिक प्रेम करने वाला, कठोर शब्‍द बोलने वाला, कंजूस, निर्दय, गुरुजनों से परित्‍यक्‍त, चोर, दंभी, धन के लोभ से शत्रुओं तक से मिल जाने वाला, अधिक लज्‍जाशील.
वात्‍स्‍यायन ने पुरुषों के रूप को भी निखारने के उपाय बताए हैं. उनका मानना है कि रूप, गुण, युवावस्‍था, और दान आदि में धन का त्‍याग पुरुष को सुंदर बना देता है. तगर, कूठ और तालीस पत्र को पीसकर बनाया हुआ उबटन लगाना पुरुष को सुंदर बना देता है. पुनर्नवा, सहदेवी, सारिवा, कुरंटक और कमल के पत्तों से बनाया हुआ तेल आंख में लगाने से पुरुष रूपवान बन जाता है.

आधुनिक जीवनशैली और बढ़ती यौन-स्‍वच्‍छंदता ने समाज को कुछ भयंकर बीमारियों की सौगात दी है. एड्स भी ऐसी ही बीमारियों में से एक है. अगर लोगों को कामशास्‍त्र का उचित ज्ञान हो, तो इस तरह की बीमारियों से बचना एकदम मुमकिन है.

योन शिक्षा से योन अपराधों पर रोक? 
यौन कुंठा से होने वाले अपराधों का निदान उचित यौन शिक्षा से ही निकाला जा सकता है। यह बात विश्व स्वास्थ्य संगठन (World Health Organization) ने अब कहनी शुरू की है, जबकि भारत में 1600 साल पहले ही  ऋषि वात्स्यायन यह बात कह गए हैं। वात्स्यायन के अनुसार यह शिक्षा प्राग यौवने अर्थात यौवन काल शुरू होने से ठीक पहले यानी किशोरावस्था में दी जानी चाहिए। पहले यौवन काल की शुरुआत 16 से 18 वर्ष की उम्र में होती थी। लेकिन अब संचार माध्यमों से मिल रही जानकारियों एवं खुलेपन के माहौल के कारण यौवन काल 11-12 वर्ष की उम्र से ही शुरू हो जाता है। इसलिए उचित तरीके से यौन शिक्षा इस उम्र से पहले ही बच्चों को दी जानी चाहिए। इसकी शुरुआत परिवार में माता-पिता से ही होनी चाहिए। जब बच्चों को सही उम्र में अच्छे-बुरे की जानकारी दे दी जाएगी तो वह कुंठा के शिकार नहीं होंगे। यौन शिक्षा की बात आते ही एक वर्ग द्वारा इसका विरोध होने लगता है। वास्तव में यौन शिक्षा का अर्थ ऐसा आचरण सिखाने से है, जिसका अभ्यस्त होकर व्यक्ति भविष्य में संतुलित व्यवहार कर सके।
पिछले दशकों में योन शिक्षा को दुनिया के कई शिक्षण संस्थानों में लागु किया गया है


Africa:


Sex education in Africa has focused on stemming the growing AIDS epidemic. Most governments in the region have established AIDS education programs in partnership with the World Health Organization and international NGOs


Australia:


The Victorian Government (Australia) developed a policy for the promotion of Health and Human Relations Education in schools in 1980 that was introduced into the State's primary and secondary schools during 1981.


Asia: 

The state of sex education programs in Asia is at various stages of development.

Thailand:

The first national policy on sexuality education in schools was announced in 1938, but sex education was not taught in schools until 1978. Then it was called “Life and Family Studies".


France:


In France, sex education has been part of school curricula since 1973. 

And...

Indonesia, Mongolia, South Korea have a systematic policy framework for teaching about sex within schools. Malaysia and Thailand have assessed adolescent reproductive health needs with a view to developing adolescent-specific training, messages and materials.

In Japan, sex education is mandatory from age 10 or 11, mainly covering biological topics such as menstruation and ejaculation.

-wikipedia.






सौजन्य से – Saffron Hindurashtra (रोहित कुमार)


मंगलवार, 26 मार्च 2013

विभिन्न ग्रंथों की अनुमानित समय तालिका | Ancient Sanskrit Scriptures TimeTable


निम्न तालिका डाo पद्माकर विष्णु वार्ताक द्वारा हमारे शाश्त्रों पर गहन शोध कर प्राप्त की गई है । 



साभार : https://sites.google.com/site/vvmpune/essay-of-dr-p-v-vartak/eassy_2



SR.NO. 
     REFERENCE
            STATEMENT
BEFORE CHRIST
01
Rigveda
Rainy season on Mruga Nakshatra
23720
02
Taittiriya Samhita
Spring began on Phalguni Pornima
23720

03
Rigveda
Summer with Sun in Vrushabh Rashi
23000
04
Mahabharata
Summer Solstice on Rohini Nakshatra
22760  Vana 23000
05
Rigveda, Tait.Sam
Rainy season with Sun on Krittika
21800

06
Rigveda
Rainy season with Sun in Vrushabha
21000

07
Mahabharata
Vernal Equinox on Dhanishtha Nakshatra
2100 TO VANA
230, 2000
08
Rigved, Tait.Sam
Rainy season with Sun in Bharani Nakshtra
20840
09
Rigved
Rainy season with Sun in Shyena (Pisces)
17440

10
Valmiki Ramayan
Vernal equinox on Moola Nakshatra
17000

11
Rigveda
Winter Solstice on Phalguni Nakshatra
17000
12
Rigveda
Winter Solstice on Phalguni Nakshatra
16288

13
Rigveda
Autumn with Sun in Vrushabha Rashi
15280

14
Valmiki Ramayan
Vernal equinox on Vishakha Nakshatra
15280

15
Tait.Sam
.      Rains with Sun on Purvashadha
12200
16
Mahabharat
Star Vega slipped
12000
17
Tait.Sam
Rains with Sun on Moola Nakshatra
11240

18
Rigved 3/57/2
Rains with Sun in Dhanu Rash
10960

19
Rigved 1/164/19
Summer solstice on Jyeshtha Nakshatra
Winter solstice on Mruga Nakshatra
10280

20
Rigved
Rainy season- Sun from Mitra to Varuna
10280
21
Tait. Sam
Winter solstice on Krittika
8357

22
Valmiki Ramayana
Planetary position at Rama’s birth
7323

23
Valmiki Ramayana
Rainy season began with Ashvin Pournima
7300

24
Rigved
Rainy season with Sun in Kanya Rashi, Winter solstice Mesha
6640
25
Rigved 1/89/9
Vernal equinox at end of Punarvasu Nakshtra
6424
26
Mahabharat war
planetary positions
5561

27
Harivansha
Summer during Shravana lunar month
5000
28
Rigved 1/90/9
Summer solstice on Uttara Phalguni Nakshatra
4504
29
Rigved
Rains began with Sun in Simha Rashi (Leo)
4480
30
Sushruta Samhita
Rainy season during Bhadrapada-Ashvin months
4000

31
Shatapatha Brah
Krittika rise at exact east
3000

32
Matsya Purana
Rainy season during Shravana lunar month
2320
33
Kaushitaki Brahman
Rainy season during Shravana lunar month
2320
34
Sushrut II  edition
Winter solstice at beginning of Magha Masa
2000

35
Maitrayani Upanishad
Summer solstice at 120 º Ashlesha Nakshtra
1909
36
Vishnu Purana
Vernal equinox at head of Krittika
1652

37
Vedang Jyotish
Winter solstice on Dhanishtha
1640

38
Parashara
Summer solstice at mid-Ashlesha
1159

39
Kalidas/Bhavish Purana
Rainy season at beginning of Ashadha Masa
A.D era
40
Varahmihira
Summer solstice at Karka Rashi (Cancer)
520 AD

हमारे वेदों, उपनिषदों तथा पुराणों में वर्णित विभिन्न जानकारीयों की सूचि यहाँ देखें :-
http://www.vedicbharat.com/2013/03/Achievements-of-the-Ancient-Indians.html