अंतिम प्रभा का है हमारा विक्रमी संवत यहाँ, है किन्तु औरों का उदय इतना पुराना भी कहाँ ?
ईसा,मुहम्मद आदि का जग में न था तब भी पता, कब की हमारी सभ्यता है, कौन सकता है बता? -मैथिलिशरण गुप्त
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शनिवार, 16 नवंबर 2013

मनुस्मृति :12220 वर्ष से अधिक प्राचीन है | ManuSmriti : Atleast 12220 Years Old Law Book


इस लेख का मंतव्य यह जानना है कि वेदों के पश्चात सर्वमान्य महर्षि मनु द्वारा रचित ग्रन्थ मनुस्मृति की आयु क्या है अर्थात यह लगभग कितना पुराना है ?

यह सिद्धांत अत्यंत सहज तर्क पर कार्य करेगा जैसे की कोई व्यक्ति पिता बनने से पूर्व अपने पुत्र वा पुत्री के बारे में नही जान सकता किन्तु पुत्र अपने पिता के बारे में सदैव जनता है ।

अतः इस लेख में हम पर्याप्त तर्कों व् प्रमाणों से सिद्ध करेंगे की मनु महाराज की पुस्तक मनुस्मृति महाभारत काल तथा रामायण काल से भी अधिक प्राचीन है अर्थात कम से कम 12220 वर्ष पूर्व तक विधमान थी । यहाँ हमने कम से कम 12220 वर्ष  पूर्व लिखा है अतः ये उससे भी अधिक प्राचीन है किन्तु निश्चित समय बता पाना अभी के लिए सम्भव नही ।

महाभारत काल - 

सभी को विदित है की महाभारत का समय लगभग 3000  ईसा पूर्व का था अर्थात आज से लगभग 5000 वर्ष पूर्व । यदि प्रमाण चाहे तो यहाँ जाएँ वैज्ञानिक पद्धति दवरा विश्लेषण किया गया है -
https://sites.google.com/site/vvmpune/essay-of-dr-p-v-vartak/xx

महाभारत में मनुस्मृति के श्लोक - 

महर्षि वेदव्यास (कृष्णद्वेपायन ) रचित महाभारत में मनुस्मृति के श्लोक व् मनु महाराज कि प्रतिष्ठा अनेकों स्थानो पर आयी है किन्तु मनु में महाभारत वा व्यास जी का नाम तक नही ।

महाभारत में मनु महाराज की प्रतिष्ठा - 
मनुनाSभिहितम् शास्त्रं यच्चापि कुरुनन्दन ! महाभारत अनुशासन पर्व , अ० ४ ७  - श ० ३ ५ 
तैरेवमुक्तोंभगवान् मनु: स्वयम्भूवोSब्रवीत् । महाभारत शांतिपर्व , अ० ३ ६   - श ० ५ 
एष दयविधि : पार्थ ! पूर्वमुक्त : स्वयम्भूवा । महाभारत अनुशासन पर्व , अ० ४ ७  - श ० ५ ८ 
सर्वकर्मस्वहिंसा हि धर्मात्मा मनुरब्रवीत् ।  महाभारत शांतिपर्व , मोक्षधर्म आदि । 

अतः सिद्ध होता है कि मनु महाभारत के समय उपस्थित थी तभी महाभारत रचयिता ने स्वयं राजसी मनु के कथनो को प्रमाण स्वरुप लिखा है ।

अब प्रतिवादी तर्क कर सकता है कि मनु महाभारत में थी ये तो स्पष्ट हो गया परन्तु श्लोकबद्ध मनु उस समय उपलब्ध थी वा नही ? ये स्पष्ट नही हुआ ।

अतः अब ये देखें -

अद्भ्योSग्निब्रार्हत: क्षत्रमश्मनो लोहमुथितं । 
तेषाम सर्वत्रगं तेजः स्वासु योनिशु शाम्यति ।। - मनु अ०  ९ - ३ २ १ 

ठीक यही मनु का श्लोक महाभारत शांतिपर्व अ० ५ ६    - श २ ४ 
में आया है और महाभारत के इस श्लोक से ठीक पूर्व २ ३ वें श्लोक में आया है -
"मनुना चैव राजेंद्र ! गीतो श्लोकों महात्मना"
अर्थात हे राजेंद्र ! मनु नाम महात्मा ने इन श्लोकों को कहा है !

इसी प्रकार मनु के जो जो श्लोक ज्यों के त्यों महाभारत में है ;
मैं यहाँ अब केवल उनके श्लोक नम्बर ही लिखा रहा हूँ

मनु ० १ १ /७ - महा० शांति अ ० १६५ - श ० ५
मनु ० १ १ /१२  - महा० शांति अ ० १६५ - श ० ९
मनु ० १ १ /१८ ०   - महा० शांति अ ० १६५ - श ० ३ ७
मनु ० ६  /४५    - महा० शांति अ ० २४५  - श ० १५
मनु ० २  /१२०     - महा०अनु ० अ ०१०४ - श ० ६४

अब वो श्लोक लिखते है जो मनु के है परन्तु कुछ परिवर्तन के साथ आयें है -

यथा काष्ठमयो हस्ती यथा चर्ममयो मृग: ।
यश्च विप्रोSनधियान  स्त्रयते नाम बिभ्रति । ।  - मनु २ /१५७ 

यथा दारुमयो हस्ती यथा चर्ममयो मृग: ।
ब्राह्मणश्चानधियानस्त्रयते नाम बिभ्रति । ।  -महा  शांति ३६/४७ 

अब केवल उनके श्लोक नम्बर ही लिखा रहा हूँ जो  कुछ परिवर्तन के साथ आयें है -

मनु ० १ १ /४ - महा० शांति अ ० १६५ - श ० ४
मनु ० १ १ /१२  - महा० शांति अ ० १६५ - श ० ७
मनु ० १ १ /३७  - महा० शांति अ ० १६५ - श ० २ २
मनु ० ८  /३७२  - महा० शांति अ ० १६५ - श ० ६३
मनु ० २  /२३१  - महा० शांति अ ० १०८ - श ० ७
मनु ० ९  /३  - महा० अनु अ ० ४६ - श ० १४
मनु ० ३ /५५   - महा० अनु अ ० ४६ - श ० ३

लगभग मनु के  ५ ० ऐसे श्लोक है जो ज्यों के त्यों वा कुछ परिवर्तन के साथ महाभारत में आये  है ।

इतने प्रमाणो के रहते कोण कह सकता है कि मनु महाभारत समय में श्लोकबद्ध अवस्था में न थी ?

अतः अब सिद्ध हुआ कि मनु कम से कम 5000 वर्ष तो पुरानी है ही !!

रामायण काल - 
रामायण काल का समय लगभग 7300  ईसा पूर्व का माना जाता है अर्थात आज से लगभग 9300 वर्ष पूर्व । यदि प्रमाण चाहे तो यहाँ जाएँ वैज्ञानिक पद्धति दवरा विश्लेषण किया गया है -
https://sites.google.com/site/vvmpune/essay-of-dr-p-v-vartak/ram
http://www.bookganga.com/eBooks/Books/Details/5484187422894534051


वाल्मीकि रामायण में मनुस्मृति के श्लोक - 

महर्षि वाल्मीकि  रचित रामायण में मनुस्मृति के श्लोक व् मनु महाराज कि प्रतिष्ठा आयी है किन्तु मनु में वाल्मीकि , राम जी आदि का नाम तक नही ।

वाल्मीकि रामायण में मनु महाराज की प्रतिष्ठा - 

किष्किन्धा काण्ड में जब श्री राम अत्याचारी बाली को घायल कर उसके आक्षेपों के उत्तर में अन्यान्य कथनो के साथ साथ यह भी कहते है कि तूने अपने छोटे भाई सुग्रीव कि स्त्री को बलात हरण कर और उसे अपनी स्त्री बना अनुजभार्याभिमर्श का दोषी बन चूका है , जिसके लिए (धर्मशास्त्र ) में दंड कि आज्ञा है ।
इस पृथिवी के महाराज भरत है (अतः तू भी उनकी प्रजा है ) ; मैं उनकी आज्ञापालन करता हुआ विचरता हूँ फिर में तुझे यथोचित दंड कैसे ना देता ? जैसे -

श्रूयते मनुना गीतौ श्लोकौ चारित्र वत्सलौ ||
गृहीतौ धर्म कुशलैः तथा तत् चरितम् मयाअ || वाल्मीकि ४-१८-३०

राजभिः धृत दण्डाः च कृत्वा पापानि मानवाः |
निर्मलाः स्वर्गम् आयान्ति सन्तः सुकृतिनो यथा || वाल्मीकि ४-१८-३१

शसनात् वा अपि मोक्षात् वा स्तेनः पापात् प्रमुच्यते |
राजा तु अशासन् पापस्य तद् आप्नोति किल्बिषम् || वाल्मीकि ४-१८-३२

उपरोक्त श्लोक ३० में मनु का नाम आया है और श्लोक ३१ , ३२ भी मनु महाराज के ही है !
उपरोक्त श्लोक किंचित पाठभेद (परन्तु जिससे अर्थ में कुछ भी भेद नही आया ) मनु अध्याय ८ के है ! जिनकी संख्या कुल्लूकभट्ट कि टिकावली में ३१८ व् ३१९ है -

राजभिः धृत दण्डाः च कृत्वा पापानि मानवाः |
निर्मलाः स्वर्गम् आयान्ति सन्तः सुकृतिनो यथा || वाल्मीकि ४-१८-३१

राजभिः धूर्त दण्डाः च कृत्वा पापानि मानवाः |
निर्मलाः स्वर्गम् आयान्ति सन्तः सुकृतिनो यथा || मनु  ८ / ३१८

शसनात् वा अपि मोक्षात् वा स्तेनः पापात् प्रमुच्यते |
राजा तु अशासन् पापस्य तद् आप्नोति किल्बिषम् || वाल्मीकि ४-१८-३२

शसनाद्वा  अपि मोक्षाद्वा स्तेनः स्तेयाद विमुच्यते |
अशासित्वा तू तं राजा स्तेनस्याप्नोति किल्बिषम् ॥ मनु ८/३१६

अतः यह सिद्ध हुआ कि श्लोकबद्ध मनु रामायण के पूर्व भी विधमान थी । यदि कोई कहे ये क्यों न माना
जाये कि उपरोक्त दोनो श्लोक वाल्मीकि से मनु में आयें हो ?
इसका उत्तर यह है कि महर्षि वाल्मीकि  रचित रामायण में मनुस्मृति के श्लोक व् मनु महाराज कि प्रतिष्ठा अनेकों स्थानो पर आयी है किन्तु मनु में वाल्मीकि , राम जी आदि का नाम तक नही और रामायण में स्पष्टतः मनु के श्लोकों (मनुना गीतौ श्लोकौ) कि प्रशंसा विधमान है ठीक उसी प्रकार जैसे महाभारत में थी "मनुना चैव राजेंद्र ! गीतो श्लोकों महात्मना" - महाभारत शांतिपर्व अ० ५ ६ - श २ ३ 

अतः अब सिद्ध हुआ कि मनु कम से कम 9000 वर्ष तो पुरानी है ही !! 

किन्तु - 
चीन से प्राप्त पुरातात्विक प्रमाण -
विदेशी प्रमाणो मनुस्मृति के काल तथा श्लोको कि संख्या की जानकारी कराने वाला एक महत्वपूर्ण पुरातात्विक प्रमाण चीनी मिला है । सन १९३२ में जापान ने बम विस्फोट द्वारा चीन कि ऎतिहासिक दीवार को तोडा तो उसमे से एक लोहे का ट्रंक मिला जिसमे चीनी भाषा कि प्राचीन पांडुलिपियां भरी थी । वे हस्तलेख Sir Augustus Fritz George के हाथ लग गये वो उन्हें लंदन ले गया और ब्रिटिश म्युजियम में रख दिया ।
उन हस्तलेखों को Prof. Anthony Graeme ने चीनी विद्वानो से पढ़वाया तो जानकारी मिली -
चीन के राजा Chin-Ize-Wang ने अपने शासनकाल में यह आज्ञा दी कि सभी प्राचीन पुस्तकों को नष्ट कर दिया जावे जिससे चीनी सभ्यता के सभी प्राचीन प्रमाण नष्ट हो जावे । तब किसी विद्याप्रेमी ने पुस्तकों को ट्रंक में छिपाया और दीवार बनते समय चिनवा दिया । संयोग से ट्रंक विस्फोट से निकल आया ।
चीनी भाषा के उन हस्तलेखों मेसे एक में लिखा है -
'मनु का धर्मशास्त्र भारत में सर्वाधिक मान्य है जो वैदिक संस्कृत में लिखा है और दस हजार वर्ष से अधिक पुराना है'
तथा इसमें मनु के श्लोकों कि संख्या 630 भी बताई गई है किन्तु वर्त्तमान में मनु में 2400 के आस पास श्लोक है ।

The wording is such as to pay high tribute to the genius and influence of the Emperor, but it also proves that many hundreds of years ago this Emperor and his people were possessed of knowledge and ideals, laws, and principles which we are apt to think are quite modern. For instance, The manuscript shows that the Chinese emperor and his people had adopted the Laws of Manu which were written in the Vedic language ten thousand years ago. 
http://rosicrucian.50webs.com/hsl/hsl-light-from-china.htm


यह विवरण मोटवानी कि पुस्तक 'मनु धर्मशास्त्र : ए सोशियोलॉजिकल एंड हिस्टोरिकल स्टडीज' पेज २३२ पर भी दिया है ।

इसके अतिरिक्त R.P. Pathak कि Education in the Emerging India में भी पेज १४८ पर है जो लिंक हम आपको दिए देते है -
ये गूगल पुस्तक है -
http://books.google.co.in/books?id=z_OCjp-T2vIC&pg=PA148&lpg=PA148&dq=Chin-Ize-Wang&source=bl&ots=l2ZvnPXZ9z&sig=F9jLXhHQtOm9-jwGTXjkz9KBzQw&hl=en&sa=X&ei=ZcOGUrPZI46BrgepiIGQCQ&ved=0CDMQ6AEwAQ#v=onepage&q=Chin-Ize-Wang&f=false

इस दीवार के बनने का समय लगभग  220–206 BC बताया जाता है अर्थात लिखने वाले ने कम से कम 220BC से पूर्व ही मनु के बारे में अपने हस्तलेख में लिखा  220+10000 = 10220 ईसा पूर्व ; आज से 12,220 वर्ष पूर्व कम से कम तक मनुस्मृति उपलब्ध थी ।

अतः अब सिद्ध हुआ कि मनु अब से कम से कम 12220 वर्ष पूर्व से और प्राचीन हो चुकी है !

साथ साथ ही यदि वेदों कि बात करें तो

अग्निवायुरविभ्यस्तु त्र्यं ब्रह्म सनातनम । 
दुदोह यज्ञसिध्यर्थमृगयु : समलक्षणम् ॥ मनु १/१३ 
जिस परमात्मा ने आदि सृष्टि में मनुष्यों को उत्पन्न कर अग्नि आदि चारो ऋषियों के द्वारा चारों वेद ब्रह्मा को प्राप्त कराये उस ब्रह्मा ने अग्नि , वायु, आदित्य और [तु अर्थात ] अंगिरा से ऋग , यजुः , साम और अथर्ववेद का ग्रहण किया ।

वेदोSखिलो धर्ममूलम् ।  मनु २/६ 
वेद सम्पूर्ण धर्म (कानून Law) का मूल है ।

यः कश्चित्कस्यचिधर्मो मनुना परिकीर्तित : । 
स सर्वोSभिहितो वेदे सर्वज्ञानमयो हि सः ॥ मनु २/९ 
मनु ने जिस किसी को जो कुछ भी धर्म कहा है वह सब वेद के अनुकूल ही है , क्योकि वेद सर्वमान्य है ।

नास्तिको वेदनिंदकः ।  मनु २/११ 
वेद कि निंदा करने वाले नास्तिक (अनीश्वरवादी) है

इत्यादि अनेक वचन है जो वेद के सन्दर्भ में मनु में आये है बल्कि यह कहना उचित होगा मनुस्मृति वेद सार ही है । अतः वेद मनु से प्राचीन है इसमें लेशमात्र भी संदेह नही ।

मनु में जहाँ कहीं भी वेद विरुद्ध आचरण दिखे वो प्रक्षेप (मिलावट ) है अतः त्याज्य है ।

मनु को जानने के लिए -
 http://www.scribd.com/fullscreen/54496732?access_key=key-1qbdavqxri27m06vvu9a&allow_share=true&view_mode=scroll


अंतिम प्रभा का है हमारा विक्रमी संवत यहाँ, है किन्तु औरों का उदय इतना पुराना भी कहाँ ?
ईसा$,मुहम्मद# आदि का जग में न था तब भी पता, कब की हमारी सभ्यता है, कौन सकता है बता?
-मैथिलिशरण गुप्त

$- 2013 वर्ष पूर्व
#-1400 वर्ष पूर्व


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वेदों की ओर लौटो । 




शनिवार, 12 अक्टूबर 2013

प्राचीन भारतीय अस्त्र विद्या | Ancient Indian Missiles & Weapons : Mahabharata Era 3000 BC


दोस्तों प्राचीन भारतीयों के पास अस्त्र सस्त्र विद्या भी थी ये हमने सीरियल आदि के माध्यम से देखा है  |
वे सभी सत्य है पदार्थ विद्या (Materials science/Materials Engineering) के जानकारों ने वे सभी हथियार बना लिए थे |
वे अस्त्र मंत्र द्वारा सिद्ध किये जाते थे यहाँ मंत्र का अभिप्राय किसी मंत्र का उच्चारण करना नही है जैसा की हम सभी मानते है वरन मंत्र अर्थात विचार ।
शब्दमय मंत्र या उच्चारण द्वारा कोई पदार्थ उत्पन्न नही किया जा सकता । यदि मंत्र द्वारा तीर पर अग्नि उत्पन्न हो तो वो सर्वप्रथम  मंत्र उच्चारण करने वाले की जिह्वा को ही भस्म कर डाले  इसलिए ऐसा मानना मिथ्या है ।
मंत्र नाम होता है विचार का जैसे राजदरबार में मंत्रणा (विचार-विमर्श) करने वाले को मंत्री कहा जाता है वैसे ही प्रकृति में पाए जाने वाले पदार्थों का पहले विचार फिर क्रिया द्वारा वे अस्त्र आदि सिद्ध किये जाते थे ।

आग्नेयास्त्र (Fire Missile) - इस प्रकार के अस्त्र में किसी लोहे का बाण (Arrow/Missile)  या गोला (Grenade)  बनाकर उसमे ऐसे उच्च जवलनशील पदार्थ रखे जाते थे जो अग्नि के लगाने से  वायु में धुआ फेलने और सूर्य की किरण या वायु के संपर्क में आने से जल उठते थे । और इन्हें किसी कमान या अन्य किसी मशीन की सहायता  से शत्रु सेना पर दाग दिया जाता था |

वारुणास्त्र (Water Missile) -  वारुणास्त्र आग्नेयास्त्र का तोड़ होता था ।  इस मिसाइल में ऐसे पदार्थों का योग होता था जिसका धुआ वायु के संपर्क में आते ही तुरंत जल की बूंदों  में परिवर्तित हो  वर्षा कर देता था और अग्नि को बुझा देता था |

नागपाश - इस प्रकार का हथियार शत्रु के अंगो को जकड के बांध लेता था |

मोहनास्त्र - इस मिसाइल में ऐसे नशीले पदार्थों का योग होता था जिसका धुंए के लगने से शत्रु की सेना निद्रास्थ अथवा मुर्छित हो जाती थी ।
इसका उपयुक्त उदहारण अश्रु गेस के गोले के रूप में समझा जा सकता है जो सरकार अक्सर शांतिपूर्ण तरीके से प्रोटेस्ट कर रहे लोगो पर करती है |

पाशुपतास्त्र (Electric Missile/Weapon) - इस प्रकार के अस्त्र में तार से या शीशे से अथवा किसी और पदार्थ से विधुत उत्पन्न  कर शत्रुओं पर छोड़ा जाता था |

इसी प्रकार तोप (Cannon) बन्दुक (Gun) आदि भी हुआ करते थे । ये नाम अन्यदेश भाषा के है आर्यावर्त या संस्कृत के नही । संस्कृत में तोप को शतघ्नी तथा बन्दुक को भुशुण्डी कहते है |

यह निश्चित है की जितनी भी विद्या तथा मत आदि भूगोल में फैले है वे सब आर्यावर्त से ही प्रचरित हुए है ।
देखो ! एक गोल्डस्टकर साहब फ़्रांस देश के निवासी अपनी पुस्तक 'बाइबिल इन इंडिया' में लिखते है की सब विद्या तथा  भलाईयों  का भंडार आर्यावर्त देश है और सब विद्या इसी देश से भूगोल में फैली है । और हम परमेश्वर से प्रार्थना करते है की जैसी उन्नति आर्यावर्त देश में थी वैसी हमारे देश की कीजिये ।
तथा 'दाराशिकोह' बादशाह ने भी यही कहा की जैसी पूरी विद्या संस्कृत में है वैसी किसी अन्य भाषा में नही । वे ऐसा उपनिषदों के भाषांतर में लिखते है की मैंने अरबी आदि  बहुत सी भाषा पढ़ी परन्तु मन का संदेह छुट कर आनंद न हुआ । जब संस्कृत देखा  और  सुना तब निसंदेह हो कर मुझ को बड़ा आनंद हुआ ।

और अधिक जानने के लिए
http://www.vedicbharat.com/2013/05/scholars-view-about-bharat.html

परन्तु ऐसे शिरोमणि देश को महाभारत के युद्ध ने ऐसा धक्का दिया की अब तक भी यह अपनी पूर्व स्थति में नही आया है क्योंकि जब भाई भाई को मरने लगे तो नाश होने में क्या संदेह है ?

जब बड़े बड़े विद्वान , राजा, महाराजा , ऋषि तथा महर्षि आदि महाभारत के भीषण युद्ध में मारे गये और बहुत से मर गये तब विद्या और वेदोक्त धर्म का प्रचार नष्ट हो चला । ईर्ष्या , द्वेष तथा अभिमान आपस में करने लगे जो बलवान हुआ वो देश को दाब कर राजा बन बैठा । वैसे ही सर्वत्र आर्यावर्त देश में खंड बंड सा राज्य हो गया । इसी क्रम  में वेद विद्या नष्ट हुई ढोंग पाखंड बढता चला गया और आर्यावर्त के पतन के दिन आरंभ हो गये ।

- महर्षि दयानंद सरस्वती , सत्यार्थ प्रकाश 


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वेदों की ओर लौटो । 


सत्यम् शिवम् सुन्दरम्

बुधवार, 3 अप्रैल 2013

भ्रूणविज्ञान : श्री मदभागवतम् | Embryology in Srimad Bhagavatam

In English : {Detailed}
EMBRYOLOGY AND CHROMOSOMES FROM SHRIMAD BHAGAWATAM

भ्रूणविज्ञान (Embryology) का अर्थ है अपने अपरिपक्व अवस्था में गर्भ में  मानव जीव का  अध्ययन ।

यह आमतौर पर कहा जाता है कि यूरोपीय देशों ने मानव जीवन के विकास को समझने का वैज्ञानिक अध्ययन किया तथा  भारत में इससे सम्बन्धी कोई खोज नही  हुई  . भारतीयों ने केवल जीवन दर्शन (philosophy) के बारे में सोचा.

कहा जाता है की भ्रूणविज्ञान पर प्राचीनतम शोध  वैज्ञानिक Aristotle (अरस्तू) (384 - 322 ई.पू.) ने की ।

महाभारत  लगभग 5561 ईसा पूर्व लिखी गई तथा श्री मदभागवतम् लगभग 1652 ईसा पूर्व लिखी गई मानी जाती है ।


महाभारत  तथा भागवत में भ्रूणविज्ञान से सम्बंधित दुनिया भर की जानकारी भरी पड़ी है ।

हमारे महान ऋषियों ने यह जान लिया था की स्त्री व पुरुष के स्राव (secretions) द्वारा रज/डिंब  (ovum) तथा शुक्राणु  (sperm) के मिलन फलस्वरूप भ्रूण (Fetus) की उत्पति होती है तत्पश्चात जीव पनपता है ।

महाभारत के शांति पर्व 117,301, 320, 331, 356 तथा भागवत 3/31 में वर्णन मिलता है की  शुक्र का एक कण शोणित के साथ क्रिया कर कलल  का निर्माण करता है ।   शुक्र  तथा शोणित को क्रमश : शुक्राणु (sperm) और अंडाणु  (ovum) तथा कलल को युग्मनज या निषेचित डिंब (Zygote)  भी कहा जाता है ।

भागवत में कहा गया है कि केवल एक ही रात में अर्थात लगभग 12 घंटे के समय में ही कलल  का निर्माण हो जाता है ।
 कलल  आगे 5 रातों के पश्चात बुलबुले  (bubble stage) रूप में आ जाता है (भागवत ३/३१/२ )

आधुनिक विज्ञानं का भी यही मत है ।  दस दिन में बेर के समान कुछ कठिन हो जाता है तथा 11 वें दिन का भ्रूण अंड (oval shaped) की भांति दिखाई पड़ता है ।

इस प्रकार भ्रूण में 15  दिनों में होने वाले सूक्ष्म परिवर्तनों (microscopic changes) का वर्णन मिलता है । आधुनिक विज्ञानं को ये सब जानने के लिए न जाने कोन  कोन सी पचासों मशीनों का प्रयोग करना पडता है ।

भागवत 3/31/3 में लिखा है प्रथम महीने के अंत तक भ्रूण का सिर विकसित हो जाता है ।
आधुनिक विज्ञान में 30-32 दिन के भ्रूण का सिर साफ़ साफ़ देखा जा सकता है ।


आगे  लिखा है  कि गर्भावस्था के दूसरे महीने में भ्रूण के हाथ-पाँव  और शरीर के अन्य भागों को विकसित होने लगते है.

6-8  सप्ताह (42-56  दिन ) के  भ्रूण में हाथ-पाँव  और शरीर के अन्य भाग आप इस चित्र में देख सकते है ।
बड़ा करने के लिए चित्र  क्लिक करें ।

A six week embryonic age or eight week gestational age intact Embryo, found in a Ruptured Ectopic pregnancy case.

आधार: विकीपीडिया
http://en.wikipedia.org/wiki/File:Human_Embryo.JPG

गर्भावस्था के तीसरे महीने में  नाखून, बाल, हड्डियां और त्वचा विकसित होने लगती है तथा जननांग विकसित होने लगते है तथा कुछ समय पश्चात गुदा (Anus ) का निर्माण होता है ।

 आधुनिक मत के अनुसार 8 सप्ताह (56 दिन =  लगभग 2 माह ) के भ्रूण  में जननांग पाए जाते है तथा पूर्णतया प्राप्त करने में तीसरा महिना आ ही जाता है ।

तथा आगे लिखा है चोथे महीने में सात प्रकार की धातुओं (tissues) का निर्माण होता है जो इस प्रकार है :

 रस  (tissue fluids), रक्त  (blood), स्नायु  (muscles), मेदा  (fatty tissue), अस्थी (bones), मज्जा  (nervous
tissue) तथा शुक्र (reproductive tissue). आधुनिक विज्ञानं का भी यही मत है ।


पांचवे महीने में शिशु में भूख तथा प्यास विकसित होती है ।  हालांकि कुछ समय पूर्व तक आधुनिक विज्ञान इसे समझ नही पाई थी परन्तु नवीनतम प्रयोगों के आधार पर यह सत्य सिद्ध होता है | देखें कैसे ?

जातविष्ठा (मल)   पेट में ग्रहणी से मलाशय तक पाया जाता है जिसमे स्वयं भ्रूण  के ही  बाल (lanugo hairs) तथा उपकला कोशिकाएँ  भी  शामिल होती  है ।   ये सभी  भ्रूण की आंत तक एमनियोटिक द्रव निगलने के फलस्वरूप ही पहुँच सकते हैं  । एमनियोटिक द्रव (amniotic fluid)  वह द्रव है जिसमे भ्रूण स्थित  होता है  । बाल (lanugo hairs) और उपकला कोशिकाएँ भ्रूण की  त्वचा द्वारा ही एमनियोटिक द्रव में गिरती है जिसे भ्रूण ग्रहण करता है ।  और  इन  बालो (lanugo hairs) तथा उपकला कोशिकाओं का शिशु की आंतों में पाया जाना  जठरांत्र संबंधी मार्ग  के कार्य सुचारू कार्य करने को दर्शाता है ।
 अर्थात पांचवे महीने में शिशु का जठर तंत्र तथा आंते आदि कार्य करने लगते है तथा यह भी निश्चित है  की शिशु का एमनियोटिक द्रव ग्रहण करना एक स्व  प्रक्रिया  नही  है अपितु  शिशु की भूख तथा प्यास को दर्शाता है । शिशु को भूख तथा प्यास की अनुभूति होने के फलस्वरूप ही वह एमनियोटिक द्रव ग्रहण करता है ।


छठे महीने में शिशु गर्भ में घूर्णन करने लगता है अर्थात करवट लेने लगता है तथा कई प्रकार के ढकाव (एमनियोटिक द्रव/उतकों  आदि ) द्वारा घिरा रहता है    

सातवे महीने में शिशु का मस्तिष्क कार्य करने लगता है और 7 महीने का शिशु व्यवहार्य हो जाता है ।

आधुनिक विज्ञान इस तथ्य को हाल ही में हुए एक प्रयोग के पश्चात समझ पाई है ।

श्री कृष्ण के भांजे अभिमन्यु ने युद्ध कला गर्भ में ही सीखी थी यह बात भी इससे सिद्ध होती है यहाँ देखें ।
http://www.vedicbharat.com/2013/03/the-tale-of-abhimanyu-turned-out-to-be-true-mahabharata.html


अभिमन्यु ने युद्ध कला गर्भ में सीखी इस तथ्य को विदेशी तो दूर हम भारतीय भी अब तक मिथ्या मानते थे । किन्तु आधुनिक विज्ञान में सिद्ध होने के पश्चात हमने इसे माना ।
कितने मुर्ख है हम ।
हमने  200 वर्षों तक गोरो के डंडे खाए  है , गुलाम मानसिकता इतनी जल्दी थोड़ी जाएगी !!!

हमारी प्राचीन परंपराओं में गर्भवती स्त्री को अच्छी पुस्तके तथा रामचरितमानस आदि पढने के सलाह दी जाती थी । इससे भी यह स्पष्ट है की हमारे पूर्वज इस तथ्य को जानते थे की  6-7 माह का शिशु सिखने लगता है  अर्थात व्यवहार्य  हो जाता है ।

आगे कहा  गया है कि भ्रूण अपनी माँ द्वारा किये गये भोजन आदि के  पोषण से ही बढ़ता है. तथा शिशु स्वयं द्वारा किये गए  मूत्र और मल तथा एमनियोटिक द्रव के बिच ही बढ़ता रहता है ।

कुछ वर्ष पूर्व तक आधुनिक विज्ञान का मानना तथा की शिशु अपनी माता  के अपशिस्ट  पदार्थ में पलता है किन्तु अब यह सिद्ध हो चूका है की वह अपशिस्ट  माता का नही वरन स्वयं शिशु का ही होता है ।

8वे श्लोक में कपिल मुनि लिखते है  कि शिशु अपनी पीठ और सिर के बल पर ही  स्थित होता है .


9वे श्लोक  का कहना है कि शिशु साँस लेने में असमर्थ  होता है  क्योंकि शिशु एमनियोटिक द्रव में निहित होता है  जिसके कारन साँस लेने की आवश्यकता नही होती .शिशु को ऑक्सीजन और अन्य पोषक तत्व माँ के खून द्वारा प्राप्त होते  है .

किन्तु कितने दुःख की बात है आज के अपनी स्त्रियों के गुलाम पुरुषों के राजमहल में अपनी माँ के लिए  एक कमरा भी नही ?? डूब मरो जल्दी से जल्दी !!!    

श्लोक  22 में  कपिल मुनि लिखते  है कि 10 महीने में भ्रूण को नीचे की और प्रसूति वायु द्वारा धकेला जाता है ।
इस प्रकार गर्भ में भ्रूण से शिशु निर्माण की प्रक्रिया सूक्ष्म रूप से भागवत 2/10/17 से 22, 3/6/12 से 15 तथा 3/26/54 से 60 में मिलता है जिसमे  मुह,नाक,आँखे,कान, तालू, जीभ और गला आदि शामिल है । तथा (3/6/1 से 5) तक में  जिव निर्माण में योगदान देने वाले 23 गुणसूत्रों का भी वर्णन मिलता है ।

आधुनिक विज्ञान में कहा गया है  एक शुक्राणु के 22 गुणसूत्र, एक अंड के साथ मिलकर भ्रूण निर्माण करते है ।  बिलकुल यही तथ्य आज से लगभग 7500 वर्ष पूर्व लिखी गई महाभारत में भी मिलता है ।

भागवत (2/10, 3/6, 3/26) में लिखा है जननांग तथा  गुदा आदि के पश्चात ह्रदय का निर्माण होता है । यह तथ्य   1972 में H.P.Robinson द्वारा  Glasgow University में ultrasonic Doppler technique के माध्यम से सिद्ध किया  जा चुके है ।

भागवत में लिखा है दोनों कानो में प्रत्येक का कार्य ध्वनी तथा दिशा का ज्ञान करना है यह तथ्य 1936 में Ross तथा Tait  नामक वैज्ञानिकों द्वारा सिद्ध किया गया की दिशा का गया आन्तरिक कान में स्थित Labyrinth नामक संरचना द्वारा होता है । इसका वर्णन ऐतरेय उपनिषद (लगभग 6000 से 7000  ईसा पूर्व ) 1/1/4 तथा 1/2/4 में भी मिलता है ।

ऐसे कई प्रश्न  है जिसका उत्तर आधुनिक विज्ञान के पास नही है क्योंकि उनके पास केवल भोतिक ज्ञान है अध्यात्मिक नही ।  हमारे ऋषियों के पास प्रत्येक प्रश्न का उतर  था  क्योकि वे भोतिक के  साथ  अध्यात्मिक ज्ञान में  भी धुरंदर थे ।

उदहारण के लिए : हम जानते है की निषेचन के पश्चात करोडो शुक्राणु, एक मादा अंड की ओर दौड़ते है किन्तु केवल एक ही शुक्राणु अंड में प्रवेश करने में सफल होता है और भ्रूण का  निर्माण करता है ।

आधुनिक विज्ञानियों के पास इसका कोई उतर नही की करोडो की  दौड़ में एक ही जीता बाकि मुह देखते रह गये ?

परन्तु ऋषियों के पास इसका सॉलिड उतर था । उन्होंने कहा जीवात्मा अमर है जैसा की श्री कृष्ण ने गीता में भी कहा है ।  मृत्यु  के पश्चात आत्मा भोतिक शरीर को  छोड़कर भुवर्लोक में गमन करती है । वर्षा द्वारा पुनः पृथ्वी पर आती है वर्षा जल पेड-पोधों द्वारा अवशोषित किया जाता है  इस प्रकार जीवात्मा खाद्यान्न (food grain) में प्रवेश करती है। जो भोजन के साथ पुरुष के शरीर में पहुँचती है और शुक्राणु बनता है ।
ओर जब करोडो शुक्राणुओ की दौड़ प्रारंभ होती है वही एक शुक्राणु विजयी होता है जिसमे प्राण/जीवात्मा निहित होती है । वही जीवआत्मा  (जो परमआत्मा (ईश्वर) का अंश है) उस शुक्राणु का मार्ग दर्शन कर विजयी बनाती है ।

जबकि आधुनिक विज्ञान का कहना है की यह एक अवसर मात्र ही है की कोई एक जीत  गया ।

इसी प्रकार का एक और प्रश्न  है की प्रसव (delivery) के लिए कोन उतरदायी है विज्ञान के पास दो उतर है या तो माँ या फिर स्वयं शिशु ।

यदि माँ प्रसव के लिए उतरदायी है तो प्रत्येक प्रसव काल (gestation period) में परिवर्तन क्यों ?
और यदि शिशु उतरदायी है तो सातवे महीने में शिशु का मस्तिष्क कार्य करने लगता है फिर भी वह दो महीने और गर्भ में क्यो ठहरता है ?

ऋषियों का कहना है की जब शिशु में प्राण प्रवेश करता है तब वह एमनियोटिक द्रव से बाहर निकने की चेष्टा करता है और दुनिया में आता है ।  इस प्रकार प्रसव, प्राण पर निर्भर करता है न की माता पर और  न ही शिशु पर ।
भागवत 3/26/63 से 70 में लिखा है की जब शिशु का प्रत्येक अंग आदि कार्य करने प्रारंभ कर देते है तब तक भी वह द्रव से बाहर नही निकलता जब तक अंततः  उसके चित में क्षेत्रज आत्मा का प्रवेश नही होता ।

उपरोक्त समस्त अध्यन microscope आदि के अभाव में नही किये जा सकते । इससे यह भी स्पस्ट है की उस समय microscope जैसे यन्त्र भी थे !

कोशिका विभाजन 
भागवत 3/6/7 में लिखा है की
भ्रूण सर्वप्रथम एक बार विभाजित होता है,
ऐसा दस बार होता है
और फिर तिन बार और होता है ।
उपरोक्त को तिन अलग अलग बार लिखा गया है क्योंकि विभाजन तीन परतों/चरणों में होता है ।
प्रत्येक विभाजन में पहले निर्मित कोशिकाओं से संख्या दुगुनी हो जाती है ।

इन्ही बढ़ती हुई कोशिकाओं से भ्रूण के शरीर का विकास होता है ।
आधुनिक विज्ञान में इन तीन चरणों को ectoderm, endoderm तथा mesoderm कहा जाता है ।


मात्र  साफ़, महंगे विदेशी  वस्त्र पहनने तथा टाई लटका लेने से कोई बुद्धिमान नही हो जाता ।  उपरोक्त सारे अनुसन्धान हमारे ऋषि लोगो ने भगवा धारण किये ही किये थे । 




साभार : श्री पद्माकर विष्णु वार्तक, वेद विज्ञान मंडल, पूणे। 

अधिक जानकारी के लिए देखें :
EMBRYOLOGY AND CHROMOSOMES FROM SHRIMAD BHAGAWATAM {Detailed}


इससे भी अधिक जानकारी के लिए श्री मदभागवत पढ़े ।





आज यदि हमारे ग्रंथो पर पुनः शोध आरंभ की जाये  तो भारत निश्चय ही पुनः विश्व गुरु  सकता है । 

किन्तु हो उल्टा ही रहा है विदेशी हमारे ग्रंथो पर शोध करने में डूबे हुए है ये एक दक्षिण अफ्रीका की वेब साईट है  
http://www.hinduism.co.za/index.html

जो सनातन धर्म को समर्पित है इस साईट में जा कर जरा बायीं और मेन्यु तो देखें । 

.co.za domain south africa का है ठीक उसी प्रकार जैसे co.in india के लिए है यहाँ देखें : 

http://www.africaregistry.com/

इसी प्रकार एक अमेरिकन stephen knapp ने वेदों आदि पर गहन शोध की है :

http://stephen-knapp.com/
25-30 पुस्तकें भी लिख चुके है । 

https://www.facebook.com/stephen.knapp.798

इसके अतिरिक ऐसे कितने ही प्रसिद्ध वैज्ञानिकों के नाम हम आपको गिना सकते है जिन्होंने वेद-उपनिषद भर पेट पढ़े जैसे : निकोल टेस्ला, श्रोडेंगर, आइंस्टीन, नील्स बोहर, राबर्ट औपेन हाइमर, कार्ल सेगन.................



Quantum Physics came from the Vedas: Schrödinger, Einstein and Tesla were all Vedantists.


यहाँ देखें :


NASA तो संस्कृत के पीछे पागल है यहाँ देखें :
http://hindi.ibtl.in/news/international/1978/article.ibtl

America is creating 6th and 7th generation super computers based on Sanskrit language. Project deadline is 2025 for 6th generation and 2034 for 7th generation computer. After this there will be a revolution all over the world to learn Sanskrit.
-A NASA scientist

http://www.ariseindiaforum.org/they-broke-our-vedic-back-bone/

हम पेंटियम 4 चला कर प्रसन्न हो रहे है पेंटियम 6-7  बनने वाला है पूरा : संस्कृत में  


"अमेरिका की यूनीवर्सिटी में गीता पढ़ना अनिवार्य"
यहाँ देखे :

http://khabar.ibnlive.in.com/news/6405/2


ये बिकाऊ भांड दलाल  मीडिया कभी भी इस प्रकार की गौरवांवित करने वाली खबरे टीवी पर नही दिखाएगा 


हमेशा रोने पीटने की ख़बरें ही दिखायेगा ।  सब धन की माया है !!!


मैं पूछता हूँ  हम कब तक गुलाम बने रहेगे ???




TIME TO BACK TO VEDAS
वेदों की ओर लौटो । 


सत्यम् शिवम् सुन्दरम्






शनिवार, 2 मार्च 2013

श्री कृष्ण के भांजे अभिमन्यु की कथा की पुष्टि {Abhimanyu's Tale}

महाभारत आदि को मिथ्या मानने वालो के मुँह पर एक और थाप |

महाभारत के इस प्रसंग को सभी जानते है की एक समय जब श्री कृष्ण की बहन सुभद्रा गर्भ धारण किये हुए थी तब श्री कृष्ण उन्हें चक्रव्युह का तोड़ बता रहे थे असल में श्री कृष्ण तो ठहरे सर्वज्ञ, वे बता तो उसी शिशु (अर्जुन पुत्र :-अभिमन्यु) को रहे थे जो  सुभद्रा के गर्भ में था क्योंकि वे जानते थे की इस शिशु को आगे जा कर इस रणनीति की परम आवश्यकता पड़ेगी । परन्तु नियति कुछ और ही थी । चक्रव्युह का वर्णन सुनते सुनते सुभद्रा जी की आंख लग गई और वर्णन केवल चक्रव्युह में घुसने (तोड़ने) तक ही हो पाया था निकलने का सुनने से पूर्व ही सुभद्रा जी सो गई । और इसी कारण श्री अभिमन्यु चक्रव्युह में घिर कर ही वीरगति को प्राप्त हुए थे |
इस प्रसंग को श्री व्यास जी ने इस प्रकार लिखा है :


ओम ओम ओम
श्री कृष्णेन सुभद्राये गर्भवत्येनिरुपितम
चक्रव्यूह प्रवेशस्य रहस्यम चातुदम्भितत
अभिमन्यु स्तिथो गर्भे द्विवेद्यनानयुतो श्रुणो
रहस्यम चक्रव्यूहस्य स.म्पूर्णम असत्यातवा

यदार्जुनो गतोदुरम योदूं सम्शप्तदैसः
अभिमन्यु.म बिनानान्यः समर्द्योव्यूहभेदने
भेदितेचक्रव्यूहेपि अतएव विबिणेवा
पार्थपुत्रस्य एकाकी कौरवे निगुर्णेवतः



लोग इस पौराणिक कथा को कल्पना पर आधारित मानते हैं | ये कल्पना नही हमारा इतिहास है और अक्षर अक्षर सत्य है |

हालही में हुए एक प्रयोग (2 जनवरी 2013 को) में वैज्ञानिकों ने खोज निकाला है के गर्भ के शिशुओं भी भाषण की ध्वनि सीखता है | तथा वैज्ञानिकों ने महाभारत के इस प्रसंग पर भी मुहर लगाई |
नवीनतम वैज्ञानिक सबूत से पता चला है कि बच्चे उनके गर्भ के समय से ही सुनते है और भाषा कौशल सीखते है। फ्रांसीसी वैज्ञानिकों का कहना है कि गर्भ के बच्चे अपने जन्म के तिन महीने पहले ही भाषण ध्वनियों में अंतर करना सिख जाता है। (vedicbharat.com) अमेरिका में Pacific Lutheran University के शोधकर्ताओं ने एक नए अध्ययन में पता लगाया है कि बच्चे गर्भाशय में भी मातृभाषा के विशिष्ट ध्वनियों चुन सकते हैं। अध्ययन ने इस अनुमान को नकार दिया है कि बच्चे पैदा होने के बाद ही भाषा सीखते है। “ यह पहला अध्ययन है जिससे पता चलता है की हम पैदा होने से पहले ही अपनी मातृभाषा की भाषण ध्वनियों को सीखते है ” - क्रिस्टीन मुन, जो अध्ययन का नेतृत्व कर रहे उन्होंने कहा:- ज्यादातर वैज्ञानिक अब आश्वस्त है कि अर्जुन के पुत्र अभिमन्यु ने युद्ध के चक्रव्यूह गठन को भेदने की कला माँ सुभद्रा के गर्भ में सीखी।

जिन्हें केवल गोरी चमड़ी वालो का कहा सत्य लगता है वो यहाँ अपनी खुजली मिटायें :-

http://www.dailymail.co.uk/indiahome/indianews/article-2256312/Tale-Abhimanyu-true-scientists-babies-pick-language-skills-womb.html


http://www.washington.edu/news/2013/01/02/while-in-womb-babies-begin-learning-language-from-their-mothers/

http://www.abc.net.au/news/2013-02-26/unborn-babies-learn-sounds-of-speech3a-study/4541788

http://ilabs.uw.edu/

http://www.shrinews.com/DetailNews.aspx?NID=8237



मंगलवार, 5 फ़रवरी 2013

प्राचीन भारत में हुए परमाण्विक युद्ध | Atomic Warfare of Mahabharata

आधुनिक परमाणु बम का सफल परिक्षण 16 जुलाई 1945 को New Mexico के एक दूर दराज स्थान में किया गया | इस बम का निर्माण अमेरिका के एक वैज्ञानिक Julius Robert Oppenheimer के नेतृत्व में किया गया |
इन्हें परमाणु बम का जनक भी कहा जाता है | इस एटम बम का नाम उन्होंने त्रिदेव (Trinity) रखा |












{त्रिदेव (ट्रिनीटी) नाम क्यो?
परमाणु विखण्डन की श्रृंखला अभिक्रिया में २३५ भार वला यूरेनियम परमाणु,बेरियम और क्रिप्टन तत्वों में विघटित होता है। प्रति परमाणु ३ न्यूट्रान मुक्त होकर अन्य तीन परमाणुओं का विखण्डन करते है। कुछ द्रव्यमान ऊ र्जा में परिणित हो जाता है। आइंस्टाइन के सूत्र
 ऊ र्जा = द्रव्यमान * (प्रकाश का वेग)२  {E=MC^2}
 के अनुसार अपरिमित ऊ र्जा अर्थात उष्मा व प्रकाश उत्पन्न होते है।
१८९३ में जब स्वामी विवेकानन्द अमेरिका में थे,उन्होने वेद और गीता के कतिपय श्लोकों का अंग्रेजी अनुवाद किया था। यद्यपि परमाणु बम विस्फोटट कमेटी के अध्यक्ष ओपेन हाइमर का जन्म स्वामी जी की मृत्यु के बाद हुआ था किन्तु राबर्ट ने श्लोकों का अध्ययन किया था। वे वेद और गीता से बहुत प्रभावित हुए थे। वेदों के बारे में उनका कहना था कि पाश्चात्य संस्कृति में वेदों की पंहुच इस सदी की विशेष कल्याणकारी घटना है। उन्होने जिन तीन श्लोकों को महत्व दिया वे निम्र प्रकार है।
१. राबर्ट औपेन हाइमर का अनुमान था कि परमाणु बम विस्फोट से अत्यधिक तीव्र प्रकाश और उच्च ऊ ष्मा होगी, जैसा कि भगवान कृष्ण द्वारा अर्जुन को विराट स्वरुप के दर्शन देते समय उत्पन्न हुआ होगा। गीता के ग्यारहवें अध्याय के बारहवें श्लोक में लिखा है-
दिविसूर्य सहस्य भवेयुग पदुत्थिता
यदि मा सदृशीसा स्यादा सस्तस्य महात्मन:

अर्थात आकाश में हजारों सूर्यों के एक साथ उदय होने से जो प्रकाश उत्पन्न होगा वह भी वह विश्वरुप परमात्मा के प्रकाश के सदृश्य शायद ही हो।
२. औपेन हाइमर ने सोचा कि इस बम विस्फोट से बहुत अधिक लोगों की मृत्यु होगी,दुनिया में विनाश ही विनाश होगा। उस समय उन्हे गीता के ग्यारहवें अध्याय के ३२ वें श्लोक में वर्णित बातों का ध्यान आया-
कालोस्स्मि लोकक्षयकृत्प्रवृध्दो लोकान्समाहर्तुमिह प्रवृत:।
ऋ तेह्यपि त्वां न भविष्यन्ति सर्वे येह्यवस्थिता: प्रत्यनीकेषु योधा:।।

अर्थात मैं लोको का नाश करने वाला बढा हुआ महाकाल हूं। इस समय इन लोकों को नष्ट करने के लिए प्रवृत्त हुआ हूं,अत: जो प्रतिपक्षी सेना के योध्दा लोग हैं वे तेरे युध्द न करने पर भी नहीं रहेंगे अर्थात इनका नाश हो जाएगा।
राबर्ट का बम भी विश्व संहारक और महाकाल ही था।
३. औपेन हाइमर ने सोचा कि बम विस्फोट से जहां कुछ लोग प्रसन्न होंगे तो जिनका विनाश हुआ है वे दु:खी होंगे विलाप करेंगे,जबकि अधिकांश तटस्थ रहेंगे। इस विनाश का जिम्मेदार खुद को मानते हुए वे दुखी हुए तभी उन्हे गीता के द्वितीय अध्याय के सैंतालिसवें श्लोक का भावार्थ ध्यान आया।
श्लोक निम्र प्रकार है-
कर्मण्येवाधिकारस्ते मा फलेषु कदाचन।
मा कर्मफलहेतुर्भूर्मा ते संङ्गोह्यस्त्वकर्माणि।।

अर्थात तेरा कर्म करने का ही अधिकार है,फल का नहीं। अत: तू कर्मो के फल का हेतु मत हो,तेरी आसक्ति सिर्फ कर्म करने में ही होनी चाहिए।
तीनों श्लोकों के भावार्थ के आधार पर ही राबर्ट ने बम का नाम त्रिदेव (ट्रिनीटी) रखा। ये बात उन्होने कई बार अमेरिकी पत्रकार वार्ता और टीवी इण्टरव्यू में स्वीकार की थी।
 }साभार:   http://sarkarigupshup.com/mp/?p=49

इसके अतिरिक्त  1933 में उन्होंने अपने एक मित्र Arthur William Ryder, जोकि University of California, Berkeley में संस्कृत के  प्रोफेसर थे, के साथ मिल कर भगवद गीता का पूरा अध्यन किया  और परमाणु बम बनाया 1945 में | परमाणु बम जैसी किसी चीज़ के होने का पता भी इनको भगवद गीता तथा महाभारत से ही मिला, इसमें कोई संदेह नहीं | Robert Oppenheimer ने इस प्रयोग के बाद प्राप्त निष्कर्षों पर अध्यन किया और कहा की विस्फोट के बाद उत्पन विकट परिस्तियाँ तथा दुष्परिणाम जो हमें प्राप्त हुए है ठीक इस प्रकार का वर्णन भगवद गीता तथा महाभारत आदि में मिलते है |


इसके पश्चात खलबली मच गई तथा महाभारत और गीता आदि पर शोध किया गया और उन्होंने बताया की कई अन्य परमाण्विक बमों के अतिरिक्त एक "ब्रह्माश्त्र" नामक अस्त्र का वर्णन मिलता है जो इतना संहारक था की उस के प्रयोग से कई  हजारो लोग व  अन्य वस्तुएं न केवल जल गई अपितु पिघल भी गई|
ब्रह्माश्त्र के बारे में हमसे बेहतर कौन जान सकता है प्रत्येक पुराण आदि में वर्णन मिलता है जगत पिता भगवान ब्रह्मा द्वारा देत्यो के नाश हेतु ब्रह्माश्त्र की उत्पति हुई |
इस शोध पर लिखी गई कई किताबो में से एक है : The Atoms of Kshatriyas (यहाँ देखें)
रामायण में भी मेघनाद से युद्ध हेतु श्रीलक्ष्मण ने जब ब्रह्माश्त्र का प्रयोग करना चाहा तब श्रीराम ने उन्हें यह कह कर रोक दिया की अभी इसका प्रयोग उचित नही अन्यथा पूरी लंका साफ़ हो जाएगी |
>इसके अतिरिक्त प्राचीन भारत में परमाण्विक बमों के होने के प्रमाणों  की कोई कमी नही है । सिन्धु घाटी सभ्यता (मोहन जोदड़ो, हड़प्पा आदि) में अनुसन्धान से ऐसी कई नगरियाँ प्राप्त हुई है जो लगभग 5000 से 7000 ईसापूर्व तक अस्तीत्व में थी|
वहां ऐसे कई नर कंकाल इस स्थिति में प्राप्त हुए है मानो वो सभी किसी अकस्मात प्रहार में मारे गये हों  तथा इनमें रेडिएशन का असर भी था |
तथा कई ऐसे प्रमाण जो यह सिद्ध करते है की किसी समय यहाँ भयंकर ऊष्मा उत्पन्न हुई जो केवल परमाण्विक बम से ही उत्पन्न हो सकती है |

राजस्थान में जोधपुर से पश्चिम दिशा में लगभग दस मील की दूरी पर तीन वर्गमील का एक ऐसा क्षेत्र है जहाँ पर रेडियोएक्टिव्ह राख की मोटी सतह पाई जाती है। वैज्ञानिकों ने उसके पास एक प्राचीन नगर को खोद निकाला है जिसके समस्त भवन और लगभग पाँच लाख निवासी आज से लगभग 8,000 से 12,000 साल पूर्व किसी परमाणु विस्फोट के कारण नष्ट हो गए थे। एक शोधकर्ता के आकलन के अनुसार प्राचीनकाल में उस नगर पर गिराया गया परमाणु बम जापान में सन् 1945 में गिराए गए परमाणु बम की क्षमता के बराबर का था।
मुंबई से उत्तर दिशा में लगभग 400 कि.मी. दूरी पर स्थित लगभग 2,154 मीटर की परिधि वाला एक अद्भुत विशाल गड्ढा (crater), जिसकी आयु 50,000 से कम आँकी गई है, भी यही इंगित करती है कि प्राचीन काल में भारत में परमाणु युद्ध हुआ था। शोध से ज्ञात हुआ है कि यह गड्ढा  crater) पृथ्वी पर किसी 600.000 वायुमंडल के दबाव वाले किसी विशाल के प्रहार के कारण बना है किन्तु  इस गड्ढे (crater) तथा इसके आसपास के क्षेत्र में उल्कापात से सम्बन्धित कुछ भी सामग्री नहीं पाई जाती। फिर यह विलक्षण गड्ढा  crater) आखिर बना कैसे? सम्पूर्ण विश्व में यह अपने प्रकार का एक अकेला गड्ढा (crater) है।

महाभारत में सौप्टिक पर्व अध्याय १३ से १५ तक ब्रह्मास्त्र के परिणाम दिये गए है|
Great Event of the 20th Century. How they changed our lives ? नामक पुस्तक  में हिरोशिमा नामक जापान के नगर पर परमाणु बम गिराने के बाद जो परिणाम हुए उसका वर्णन हैं, दोनों वर्णन मिलते झूलते हैं । यह देख हमें विश्वास होता हैं कि 3 नवंबर 5561 ईसापूर्व (आज से 7574 वर्ष पूर्व ) छोड़ा हुआ ब्रह्मास्त्र एटोमिक वेपन अर्थात परमाणु बम ही था ।
महाभारत युद्ध का आरंभ 16 नवंबर 5561 ईसा पूर्व हुआ और 18 दिन चलाने के बाद 2 दिसम्बर 5561 ईसा पूर्व को समाप्त हुआ उसी रात दुर्योधन ने अश्वथामा को सेनापति नियुक्त किया । 3 नवंबर 5561 ईसा पूर्व के दिन भीम ने अश्वथामा को पकड़ने का प्रयत्न किया । तब अश्वथामा ने जो ब्रह्मास्त्र छोड़ा उस अस्त्र के कारण जो अग्नि उत्पन्न हुई वह प्रलंकारी थी । वह अस्त्र प्रज्वलित हुआ तब एक भयानक ज्वाला उत्पन्न हुई जो तेजोमंडल को घिर जाने मे समर्थ थी ।
तदस्त्रं प्रजज्वाल महाज्वालं तेजोमंडल संवृतम ।। ८ ।।

इसके बाद भयंकर वायु चलने लगी । सहस्त्रावधि उल्का आकाश से गिरने लगे ।
आकाश में बड़ा शब्द (ध्वनि ) हुआ ।  पर्वत, अरण्य, वृक्षो के साथ पृथ्वी हिल गई|
 सशब्द्म्भवम व्योम ज्वालामालाकुलं भृशम । चचाल च मही कृत्स्ना सपर्वतवनद्रुमा ।। १० ।। अ १४

यहाँ व्यास लिखते हैं कि “जहां ब्रहास्त्र छोड़ा जाता है वहीं १२ वषों तक पर्जन्यवृष्ठी (जीव-जंतु , पेड़-पोधे आदि की उत्पति ) नहीं हो पाती “।
’ब्रह्मास्त्र के कारण गाँव मे रहने वाली स्त्रियों के गर्भ मारे गए, ऐसा महाभारत लिखता है । वैसे ही हिरोशिमा में रेडिएशन फॉल आउट के कारण गर्भ मारे गए थे ।
ब्रह्मास्त्र के कारण १२ वर्ष अकाल का निर्माण होता है यह भी हिरोशिमा में देखने को मिलता है ।   
 



                                         


आधार: http://www.swadeshi.shreshthbharat.in/scientist-bharat/atom-bomb-missiles-in-mahabharat/
http://www.bibliotecapleyades.net/ancientatomicwar/esp_ancient_atomic_07.htm
http://www.bibliotecapleyades.net/ancientatomicwar/esp_ancient_atomic_07.htm